औरत हूँ औरत ही रहने दो।

औरत हूँ, औरत ही रहने दो। मजहबी धागों से न बांधो तुम, पर्दे और हिजाब मे न क़ैद करो तुम, खुली हवा में साँस मुझको भी लेने दो, औरत हूँ, औरत ही रहने दो।   तोलकर हीरे से सर से

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रात के अंधेरे में महिलाओं के लिए निकालना क्यों खौफनाक है?

यूं तो दुनिया में लोगों की तहज़ीब बेहिसाब है फिर भी क्यों हर घर का अपना ही हिसाब है कहीं पे नारी बेनकाब है, तो कहीं पे हिजाब है। अपने घरों पर चाहते ये पर्दे आम हैं वहीं सड़कों पर

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